हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी नेइमाम हुसैन (अ) की अज़ादारी में “ज़बान-ए-हाल” अर्थात भावनात्मक कथन पढ़ने से संबंधित एक प्रश्न का उत्तर दिया है। शरई अहकाम मे रूचि रखने वालो पाठको के लिए पूछे गए प्रशन और उसके उत्तर का पाठ प्रस्तुत किया जा रहा है।
प्रश्न: क्या मजलिस-ए-अज़ा में खतीब ज़बान-ए-हाल के रूप में ऐसी बातें कह सकता है जिन बातों के घटित होने का उसे यकीन न हो, उन्हें किस हद तक बयान किया जा सकता है?
उत्तर: मूल रूप से इसमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वास्तविकता से बाहर न जाया जाए और अहलेबैत (अ) की प्रतिष्ठा और मर्यादा का सम्मान किया जाए। और जिन बातों में पूर्ण निश्चितता न हो, उन्हें इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि सुनने वाले को यह समझ आ जाए कि यह संभावित बात है।
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